भूतपूर्व प्रधानमंत्री माननीय अटल बिहारी वाजपेयी को मै सियासत के गलियारे का एक अलमस्त औघड़ समझता हूं।हालांकि हमारे देश मे औघड़ो की तमाम कहानियां किवंदतियो की तरह सुनि व सुनाई जाती है,लेकिन मेरे देश ने एकलौते क्लासिकल औघड़ को भारत की सदन ने अपने चुटिले अंदाज़ मे हँसते व बोलते सुना है।
वे धुनी रमाये बैठना,चिंतन करना और किसी भी हालात से बीना घबराये उठना घंटो बोलना,आज सदन मे लोग है लेकिन वे कुशल चितेरा वे अलमस्त औघड़ मौन है!शायद अगर सदन की दिवारे जिंदा हो जाये तो उनके भी संवेदना की दिवाल से एक ध्वनि आयेगी,एक अकुलाहट होगी इनमे अटल के न होने की।
पक्ष और विपक्ष सबो के बीच मे वे साहित्यमय भाषा की कसीदाकारी,पांचजन्य का संपादन और उसके बाद राजनीति,सच तो ये है कि वे इस विष के जंगल मे चंदन की तरह बने रहे,जबकि उनके समय के ना जाने कितने साँपो ने अपने अंदर के विष से इस चंदन की शीतलता को छिनने का प्रयास किया लेकिन फिर भी अपने समय के इस चंदन ने कभी अपने स्वभाव की शीतलता को खोने नही दिया।
आज के सदन का स्तर उस बी ग्रेड की सीनेमा की तरह हो गया है जिसे हम उत्तेजक नायिका के अंग-प्रत्यंग की तरह देख तो सकते है लेकिन आदर्श नही कह सकते,क्योंकि विपक्ष के अच्छे कार्यो की सराहना करने वाला औघड़ सदन की इस मंदिर से चला गया है।
भला उनका विपक्ष में बैठकर कहा गया वे कथन कौन भुला होगा-----जब उन्होनें इंदिरा को उनके साहसिक निर्णयो के लिये बीना किसी लाग लपेट के बीना कलुषित मन के उन्हे खचाखच भरे इसी सदन मे दूर्गा कहा था।आज एैसे स्वच्छ विपक्ष का सदन मे एक भयंकर सुखा है,एैसी ही घटनाये उनके एक योग्य औघड़ होने की संतुस्ती करते है।
हमारा पड़ोसी मुल्क बम-बारुद की ढ़ेर पे बैठा इस्लाम-इस्लाम की रट लगाये इंसानी जिंदगियो की खेती कर रहा था,लेकिन एैसे में कवि हृदय अटल जी उस धुँये और बारुद के इतर----एक जीवन ज्योति की स्वच्छ परिकल्पना लिये अपने प्यार और मोहब्बत की बस लिये सरहद के उस तरफ चल पड़े,
बेशक सफलता न मिली पर हार नही मानी उस समय के इस औघड़ ने।
तमाम बिसंगतिया खड़ी की गई राष्ट्रो-उत्थान से रोका गया,तब अचानक लगा की जैसे हम हांसिये पे हो और हमारा देश कुछ चुनिंदा बैसाखियो का मोहताज़ है,लेकिन एैसा न हुआ मेरे राष्ट्र ने एक मजबूत और दृढ़ संकल्प बंद्ध प्रधानमंत्री के निर्णय का अमेरकिय धमकियो को धत्ता बता सीधे पोखरण विस्फोट से उनके औघड़ और जिद्दी राष्ट्रभक्त होने का रसपान किया।
शायद अगर मै अटल पे लिखू तो अपने लेखन की सारी उम्र और गुणवत्ता उड़ेल दु फिर भी मेरी लेखन के शब्द इस औघड़ को हुबहू कागज़ के कैनवस पे उतार नही सकते!शायद उस औघड़ के कहे शब्द---कि मै कुंवारा हु ब्रह्मचारी नही,झींगा मछली विदेशी शराब ये उस शख़्सियत के औघड़पन की वे तस्वीरे है जो विश्व मे कही अनयंत्र दुर्लभ है।
सच तो ये है कि आजाद भारत के इतिहास में अब तलक जितने भी भारतरत्न दिये गये उनमे सबसे विरला और अलहदा भारतरत्न इस सियासत के गलियारे के औघड़ को दिया जाना है।
## # अटल एक महान स्मृति।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
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