Sunday, 22 March 2020

लेख--(शादी और विवाह के निमंत्रण में छपे देवी-देवता का अपमान )

सामयिक व्यंग्य--------
(शादी और विवाह के निमंत्रण मे छपे देवी-देवता का अपमान)
इस शादी और विवाह के पुरे सीजन मे एक बात मेरे अंतर तक चुभती और कचोटती रही-----उस चुभन की वजह केवल इतनी सी थी कि जितने भी निमंत्रण आते रहे,उससे अगले की हैसियत का पता तो चलता ही था साथ ही उसके दंभ से तने----"पूँजीपति गर्दन के दर्शन का सौभाग्य तो अलग और अलौकिक था ही"।
ठीक वैसे ही चुभन और पिड़ा किसी गरीब के निमंत्रण से भी होती रही। लेकिन फिर वे विनम्र निवेदन के संग निमंत्रण देने वाले गरीब मेरे इस लेख मे क्षमा के पात्र दिखे! लेकिन जिस घटना ने मुझे सबसे ज्यादा आंदोलित और पिड़ित किया----"वे महान घटना इन विवाह के निमंत्रणो मे छपे उन तमाम हिन्दू देवी-देवताओ को देख कर हुई,जिन्हें तथाकथित धर्मावलंवी व आम गृहस्थ अपना ईश्वर कहता है"।
उसी भगवान,देवी-देवता के तस्वीर वाले कार्डो व निमंत्रणो में इन्हें हम छपवाकर जो अपमानित करने का गौरव प्राप्त करते है----"वे विश्व धर्म के किसी अन्य देश मे देखने को मिल नही सकता"।इन निमंत्रणो को पढ़ लोग इन्हें एैसी जगहो पे फेक आते है,जहां तमाम गंदगी इन्हें अपने मे आत्मसात कर हम इंसानो से कही ज्यादा स्नेह देते है।
हम हिन्दू जो कि खुद को सनातनी कह अपने छप्पन इंच के फर्जी सिने को पीट"रामलला,मथुरा,काशी का ढ़पोर शंख और चंदन पोते जगह-जगह धार्मिक परिचर्चा कर अपने महान ईश्वर,आराध्य को विश्व का विरला धर्म बता फर्जी विद्वता के मुँछो पे ताव देते है"।
कहते है कि कभी कार्ल मार्क्स ने कहा कि--"धर्म अफीम की गोली से ज्यादा खतरनाक है" ये सुक्ति कार्ल मार्क्स की आज भी उतनी ही जीवित और प्रासंगिक है।धर्म और मजहब की आड़ मे हमारा इतना बड़ा देश अक्सर जलने और सुलगने लगता है।
जबकि धर्म का शाब्दिक और एक मात्र अर्थ है अच्छि बातो और संस्कारो का धारण करना!लेकिन एैसा कुछ नही इसपे ज्यादातर मैने कुमार्गियो को ही चलते देखा है,इन्हें ही परिभाषित करते और शास्तार्थ करते देखा है।
मै किसी भी तरह के पचड़े मे नही पड़ता लेकिन एक लेखक होने के नाते"मै अपने समय की बुराई का धृतराष्ट्र नही हो सकता"।मै चैलेंज करता हूं वाकई आप अगर हिन्दू होने का---"राष्ट्रीय दंभ भरते है तो जलाइये एक अलख और जगाईये उन तमाम घरो और लोगो को! कौल और कसम खिलवाईये कि वे महंगा चाहे सस्ता----जैसा भी विवाह का कार्ड व निमंत्रण छपवाये पर उस निमंत्रण पे अपने आराध्य उन तमाम देवी-देवताओ का अपमान न करे"।
ये बुराई महज व्यक्ति की नही अपितु सारे हिन्दू समाज की है,और इस बुराई के खिलाफ एक ससक्त पहल की जरुरत है।सोचिये और खुद गौर करिये कि लगन या विवाह के सिजन में जब हम आप अपने घरो से किसी बेटी या बेटे के विवाह के लिये निकलते है तो----"तो उतनी ही दूरी मे हम तमाम देवी-देवताओ के यत्र-तंत्र पाँव से कुचलते,उड़ते और गंदगी मे पड़े कार्ड या निमंत्रण देखते है और बीना किसी धार्मिक संवेदना के हम आगे बढ़ जाते है"।
आईये हम सभी अपनी आस्था और धर्म की इस बुराई का समूल नाश करे और एक धार्मिक आंदोलन खड़ा कर हम अपने अराध्य देवी-देवताओ का अपमानित होना रोके।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758

यह लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है।

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