Friday, 6 March 2020

व्यंग्य लेख---(होली )

व्यंग्य लेख---(होली)

वे होली का एक घनघोर रोमांटिक दिन था,जब 65 वर्ष का एक नौजवान बुढा---पुरी तरह भांग की चपेट मे होकर अपने फागुनी ज्ञान से तर-बतर हो अपने पास खडे होली के सावन मे भीगे तरह-तरह से रंगे चेहरे की सुघरता को वे--"65 वर्षीय ज्ञानी उन्हें कुछ यु तक कर बाते कर रहा था जैसे आशाराम बापु किसी खोड़सी बाला का चयन कर आज अपने पुरे ज्ञान का समंदर ही उडेल देगा. होली के दिन--" भांग यहा का राष्ट्रीय प्रसाद हो जाता है और इस बुढ़े कीसी हरकतो के संग थिरकना राष्ट्रीय नृत्य".

ये भांग रुपी प्रसाद का उन्माद नही तो क्या है, की वे जिन लोगो को अक्षत कुँवारी समझ रहा वे सबके सब लडके है जोअपनी जवानी के प्रथम पायदान पर है. लेकिन वे भी आज इस प्रसाद के उन्माद को पुरी मस्ती मे छके जा रहे. 

और वे नौजवान बुढा भी अपने प्रवचन का ये अलौकिक प्रभाव देख, आनंदातिरेक मे अपने--"स्पायरी डेट की जंघाओं को बड़े ही क्लासिकल तरिके से ठोक रहा था और शायद अपनी जंघाओं को इसने कभी आजीवन इस तरिके से अपने युवाकाल मे भी न ठोका होगा".

अपने सीने के अधपके बाल को तो आज इस नौजवान बुढे ने कुछ इस तरह हाथ रख सहलाया है जैसे किसी फिल्म मे--"इमरान हाशमी ने मल्लिका सेहरावत को अपने फागुनी बिस्तर पे सुला उसे अपने वियाग्रा सी जवानी का प्रमाण दिया हो".

होली यू तो प्रतिवर्ष आता-जाता है पर हर होली अपने कुछ मधुर व रोमांटिक एहसास छोड़े जाती है. हमारे इस वृहद देश मे तमाम तरह से होली खेली जाती है. इस तरह होली को पारंपरिक तरिके के अलावा भी आधुनिक तरिके से भी मनाया जाता है यानी कि---"एक आयुर्वेदिक तरीका है जो 50 वर्ष के ऊपर के महिला व पुरूष मनाते है और दुसरे तरीके की होली जो 2020का अग्रेंजी माडल है जिसमे फाग नही गाते, न होली जलती है बस दो दिल जलते है,और होली की ये आधुनिक कलात्मकता हमारे पवित्र होली की आँखे गीली कर देती है".
आईये अब हम कुछ वर्ष होली न मनाये बल्कि हम आप मिल पहले उस होली को ढुढ़े जो हमारे अपने ही देश मे कही खो गई है.

@@@रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश).
मो.नं.7800824758

ये लेख मेरा स्वलिखित व अप्रकाशित है

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