मेरे मोहल्ले की फरजाना नीली चूड़ियों की दीवानी थी और मैं फरजाना का. उससे मेरी इसी दीवानगी ने ना जाने कब--उसके उसी मोहल्ले में एक चूड़ियों की दुकान खोलने को मजबूर कर दिया. मैं अच्छा भला जाब छोड़कर एक तरह से उसके कारण--"चूड़ियों की दुकान खोलकर चूड़ीहार हो गया".
मुझे अपनी उस चूड़ी की दुकान पे--किसी ग्राहक या खातून का इंतजार ना रहता, मेरी तो जैसे नजर ही अपनी दुकान की नीली चूड़ियों में हमेशा लगी रहती और उन नीली चूड़ियों में मुझे अपनी फरजाना ही फरजाना दिखाई देती. इसके बाद जब भी मेरी नजरें कुछ देर के लिए खाली होती तो मोहल्ले की सड़क की तरफ लगी रहती कि--ना जाने कब फरजाना खालिद के चूड़ियों की दुकान पर अपनी महबूब नीली चूड़ियां पहनने या खरीदने आएगी.
उस दिन भी खालिद जैसे नीली चूड़ियों में खोया फरजाना के बारे में सोच रहा था, जब अचानक से उसकी कानों में किसी की आवाज पड़ी और घूमते ही जो चेहरा खालिद को नुमाया हुआ--वे चेहरा कोई और नहीं फरजाना का था. उसने नीली चूड़ियां दिखाने व पहनाने को कहां. मैंने सबसे खूबसूरत नीली चूड़ी उसे दिखाई और पहनाई वह मुझे पैसे देने के लिए अपने पर्श से पैसे निकाल मेरी तरफ देने लगी तो इस दिल के चूड़ीहार खालिद के हाथ कांप गए शायद फरजाना यह भांप गई.
फिर एक जुम्मे को वे नीली चूड़ियां लेने व पहनने दुकान पर आई लेकिन आज दिल के हाथों मजबूर खालिद ने नीली चूड़ियों को देखते हुए अपने दिल की सारी बात कह दी, जिसे फरजाना ने कुबूल लिया और फिर फरजना के साथ इस चूड़ीहार का निकाह हो गया लेकिन आज भी फरजाना जब अपनी नरम और नाजुक कलाइयों में नीली चूड़ियां पहनती है तो अपने इसी चूड़ीहार से.
यह लघुकथा मेरी स्व-लिखित व अप्रकाशित है, इसके वाद-विवाद का मै स्वयं जिम्मेदार होऊंगा.
लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर pin. no. 222002 (U P )
Mo. no. 7800824758
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