मालगाड़ी से कटे मजदूर और रोटी--------
(रोटी रह गई )
जिंदगी मजदूर की खोटी रह गई,
वे मालगाड़ी से कट गया,
एक तरफ उसकी लाश,
तो दुसरी तरफ--------
ट्रेक पे चंद रोटी रह गई.
इसे भूख ही परदेश लाई,
ये रात-दिन खटता रहा,
फिर छिन गई इससे रोटी,
ये चल पड़ा परदेश से गाँव अपने,
लेकिन उफ ! रे भूख तु भी,
छिन बैठी जिंदगी मजदूर की,
वे देखो जा रही है मालगाड़ी----
बेहया, निर्लज्ज सी,
उसके पीछे ट्रेक पे,
मजदूर से होके जुदा---
चंद रोटी रह गई.
रंगनाथ द्विवेदी.
जौनपुर, mo. No. 7800824758
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