Saturday, 8 May 2021

कविता---(रोटी रह गई )

मालगाड़ी से कटे मजदूर और रोटी--------

              (रोटी रह गई )

जिंदगी मजदूर की खोटी रह गई, 
वे मालगाड़ी से कट गया, 
एक तरफ उसकी लाश, 
तो दुसरी तरफ--------
ट्रेक पे चंद रोटी रह गई. 

इसे भूख ही परदेश लाई, 
ये रात-दिन खटता रहा, 
फिर छिन गई इससे रोटी, 
ये चल पड़ा परदेश से गाँव अपने, 
लेकिन उफ ! रे भूख तु भी,
छिन बैठी जिंदगी मजदूर की, 

वे देखो जा रही है मालगाड़ी----
बेहया, निर्लज्ज सी, 
उसके पीछे ट्रेक पे, 
मजदूर से होके जुदा---
चंद रोटी रह गई. 

रंगनाथ द्विवेदी. 
जौनपुर, mo. No. 7800824758

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