Friday, 14 May 2021

कहानी---(नारे और ताली )

कहानी---(नारे और ताली )

बाजार मे देखा तो इधर -इधर किसी पार्टी की कुछ झंडे और बैनर  टंगी हुई थी. शायद आज किसी नेता की रैली व भाषण का प्रोग्राम था.क्योकि चौराहे के बाई तरफ माइक के साथ ही लोगों के बैठने के लिए कुर्सियां भी लगी हुई थी.

तकरीबन आधे घंटे बाद तो जैसे वहां भीड़ ही भीड़ दिखने लगी, जब भीड़ वहां आने वाले नेताजी के अनुकूल हुई तो,उन्हीं मे से किसी नेता के करीब ने उन्हें फोन कर दिया कि, आ जाइए! भीड़ काफी इकट्ठा हों गई है. इसके कुछ देर बाद ही, कुछ लोग उस तरफ दौड़ पड़े जिस तरफ से नेताजी कि गाड़ी को आना था.


और वाकई उसी तरफ से एक ही कलर की सात महंगी कारे वहां आकर रुकी, तो मैंने देखा कि उन सभी कारों के लास्ट के तीन नंबर सेम थे कार का गेट खुलते ही नेताजी की गरदन को वहां के स्थानीय नेताओं ने जैसे पाट दिया हों ऐसा वे केवल नेताजी  को खुश करने के लिए कर रहे थे.

और नारों का शोर तो, पूछिए मत! लेकिन इन नारे लगाने वालों के बीच मैंने एक खास बात नोट की वे यह कि उनमे से 8-10 ऐसे समर्थक थे जो अन्य से कही ज्यादा जोश और खरोश से नारे लगा रहे थे. फिर भीड़ इधर-उधर करते हुए नेताजी मंच पर जाकर बैठे एकाध स्थानीय नेता के बाद माइक उन्हें पकड़ा दी गई.

नेताजी की आवाज़ जब माइक से सुनाई दी,तो उनकी भाषा से समझ गया कि  इन्होंने दो-चार वर्ष किसी स्कूल को अवश्य अपनी भाषाई मूर्खता से गौरवान्वित किया होंगा. वे अनाप-शनाप लगातार बोले जा रहे थे और हर तीन मिनट पर उनके पीछे खड़े एक व्यक्ति ने अपनी ताली बजाकर औरो को भी ताली बजाने का संकेत कर देता था और सारी भीड़ ताली बजाने लगती.

फिर नेताजी का सम्बोधन खत्म हुआ और नेताजी के मंच से उतरते से लेकर उनके कार मे बैठकर जाने तलक इतना नारा लगा कि पूछिए मत. फिर थोड़ी देर बाद बाजार सामान्य हुआ, तो जिस चाय की  दुकान पर बैठा मैं यह सब देख रहा था. उसी चाय की दुकान पर मुझे वह दोनों आदमी आते दिखें जो की उस भीड़ मे सबसे ज्यादा नारे लगाकर ताली बजा रहे थे.

वे दोनों जब चाय की दुकान पर पहुंच गए तो एक खाली डेस्क पर बैठकर उन्होने दो बीड़ी सुलगाई और एक-एक बीड़ी अपने होठों से लगाकर दो-तीन बार अपनी नाक से धुँआ फेककर बोले यार! आज तो काफी थक गए. हाँ  यार! इतना बात करने के बाद उन्होंने दुकानदार को चाय लाने के लिए कहा.

जैसे ही दुकानदार ने उन्हें चाय पकड़ाई उन्होंने अपनी खत्म हों चुकि बीड़ी फेक दी. मैं भी उन्हीं के पास आकर चाय पीते हुए उनसे अपनी बातचीत शुरू की जब मुझे लगा कि, अब यह मेरी बात का उत्तर मेंरे अनुरूप दे सकते है. तो मैंने उनसे पुछा कि वाकई आप लोग इस पार्टी के बड़े समर्थक है.

मेरी यह बात सुनकर वे एक दुसरे कि तरफ देखकर मुस्कुराए और बोले नही साहब! ऐसा कुछ भी नही है. यह तो हम सब का धंधा है, जो भीड़ आप देख रहे थे ना कि नेताजी के लिए ताली बजा रही थी, नारे लगा रही थी, वह सारी भीड़ हमारे जैसे आदमियों की  ही थी. हमें यह सब करने के लिए किराए पर ठीकेदार लेकर आता है.जैसे ही हमारा काम खत्म होता है, हमें हमारा ठीकेदार तुरंत पैसा दे देता है.

और हाँ  आपको भी अगर कभी ताली बजाने वाले और नारे लगाने वालों को बुलाना हों तो हमें  बताइएगा, हम लोग ठीकेदार से भी सस्ते मे आदमी आपको उपलब्ध देंगे. साहब! फिर उन दोनों के चाय के पैसे भी हमी ने दिए, पैसे देकर मैं भी चाय की  दुकान से यह सोचते हुए निकला कि अब हमारी  राजनीति और हमारे नेताओं को नारे और ताली बजाने तक के लिए, किराए पर आदमी बुलाने की जरूरत पड़ रही है.जबकि एक समय वह भी था जब लोग इन नेताओं के भाषण को सुनने के लिए दुर-दुर से पैदल चलकर आते थे.


यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.

लेखक-रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.7800824758

No comments:

Post a Comment