Friday, 7 May 2021

मई,2021 के "सरस सलिल " प्रथम अंक में प्रकाशित लघुकहानी---( प्राइवेट अस्पतालों और डॉक्टर )

मई 2021 के "सरस सलिल " प्रथम अंक में प्रकाशित लघु-कहानी----(प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर  )

वह शहर का सबसे प्रसिद्ध और काफी महंगा प्राइवेट अस्पताल था, जिसकी सीढ़ियों तलक पर चमचमाते हुए संगमरमर के पत्थर लगे थे.उसी अस्पताल के अंदर एक औरत जो कि पहनावे से ही काफी गरीब लग रही थी,अपने बीमार बच्चे को,उस अस्पताल के डॉक्टर से केवल एक बार देख लेने के लिए वहां के सभी कर्मचारियों से गिड़गिड़ा रही थी अपने हाथ जोड़ रही थी, लेकिन उन सभी के कानों पर जू तक नही रेंग रही थी, बल्कि वे सभी आपस में बाते करते हुए जोर-जोर से हंस रहे थे.


वह औरत फिर भी उनके इस व्यवहार को नजर अंदाज कर,उनसे गिड़गिड़ाए जा रही थी,कि भगवान के लिए एक बार मेंरे बच्चे को डॉक्टर साहब को बुलाकर दिखा दीजिए आप सब की मुझ गरीब पर बड़ी कृपा होगी.कई बार ऐसा करने पर वह सभी बोले,  अरे जाओ! अभी डॉक्टर साहब के आने का टाइम नही हुआ है. ऐसा वे सभी उस औरत के चले जाने के लिए कह रहे थे, क्योंकि वह सभी जान गए थे कि इस औरत के पास अपने बच्चे को दिखाने के लिए एक फूटी कौड़ी तक नही है.लेकिन जिस माँ का बच्चा बीमार हो वे माँ अपने बच्चे को बचाने की कोशिश या प्रयास कैसे छोड़ सकती है.


उसने भी यह कोशिश और उम्मीद नही छोड़ी. लेकिन शायद इस बार की उसकी कोशिश से अस्पताल के सारे स्टाप उससे झूझला गए और उस औरत को जबरदस्ती हाथ सहित बेरहमी से पकड़ा और अस्पताल के बाहर कुछ इस तरह धकेला कि वह औरत अपने बीमार बच्चे के साथ गिरते-गिरते बची.


फिर वह कुछ देर उस अस्पताल के चमचमाते पत्थर लगी सीढ़ियों के एक किनारे अपने बीमार बच्चे को लेकर बैठ गई. जैसे वह डॉक्टर के आ जाने का इंतजार कर रही हो. इसी उम्मीद में वह बीच-बीच में अपने बच्चे को देखती और धीरे-धीरे थपकती जैसे वह अपने बच्चे को समझा रही हो,कि बस बेटा थोड़ी देर और बर्दाश्त कर ले फिर तू  एकदम भला चंगा हो जाएगा जबकि उसकी उस थपकी से उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही हो रही थी.


तभी उसकी कानों में डॉक्टर साहब आ गए, डॉक्टर साहब आ गए के का शोर सुनाई पड़ा, और इतना सुनते ही उसकी बुझी आँखों में जैसे अचानक कोई रौशनी आ गई हो. वह झट से उठकर अपने बच्चे को डॉक्टर को दिखाने के लिए ज्यो हि उठाने का प्रयास करती है,तो उसके बच्चे के शरीर में कोई हरकत नही होती. वह औरत बहुत जोर से चिखती है और अपने  बच्चे को लिए-दिए ही एक तरफ ढुलक जाती है.


और उस अस्पताल का पुरा स्टाप उस चिखने वाली औरत की तरफ दौड़ पड़ता है,उन दौड़ने वालों में अब वह डॉक्टर भी शामिल था जिसे दिखाने के लिए अभी थोड़ी देर पहले यह औरत उन सभी से गिड़गिड़ा रही थी.लेकिन तब इनमें से इस तरह कोई नही दौड़ा. इन सभी ने दौड़ने में बहुत देर कर दी. काश! यह सभी उसी समय दौड़े होते तो शायद यह औरत और इसका बीमार बच्चा बच गया होता.अब वही डॉक्टर उस औरत और उसके बच्चे की नब्ज़ देखने के बाद बोला कि, यह दोनों मर चुके है, इनकी डेड बॉडी जल्दी से अस्पताल के सामने से हटवाओ, इतना कहकर डॉक्टर अपने केविन की तरफ चला गया.

यह संवेदनहीनता महज़ एक शहर के अस्पताल या डॉक्टर की नही बल्कि देश के ना जाने कितने ऐसे  प्राइवेट अस्पताल और डॉक्टर की है जिसके फर्श तलक महंगे संगमरमर के टाइल्स से चमक रहे है, लेकिन उन पत्थरो की सीढ़ियों पर हर महीने कोई ना कोई ऐसी मजबूर माँ अपने बच्चे को बचाने के लिए इन बेरहम लोगों के सामने गिड़गिड़ा रही होगी.


लेकिन उसे भी कुछ इसी बेरहमी के साथ अस्पताल के बाहर सीढ़ियों की तरफ धकेल दिया जाता होगा, और वहां का डॉक्टर बिल्कुल यहां के डॉक्टर की तरह नब्ज़ देखकर कह रहा होगा की दोनों मर गए है, इनकी डेड बॉडी जल्दि से अस्पताल के सामने से हटवा कर सारे फर्श को फिनायल से साफ करवा दो.




यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.




लेखक---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo. no.7800824758

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