(इंदिरा थी)
वे दर्द थी, पीडा़ थी
वे प्रियंका नही इंदिरा थी.
वे दृढ थी, लौह थी
उसने मिथक गढ़े,
आपातकाल लगाया,
पाक को टुकड़े मे तोड़ दिया,
वे राजनीति की नपुंसक नही,
एक दहाड़ थी,
तुम प्रियंका हो वे इंदिरा थी.
वे बचपन की गूंगी गुडिया थी,
लेकिन-------
जब बोली तो लोग गूंगे हो गये,
प्रियंका तुम बस प्रियंका हो,
नकल करो,
कोयले को कोयला रहने दो,
वे हिरा थी.
दादी तलक तो ठीक है,
लेकिन वे तुम्हारी नही,
हमारे इस देश की इंदिरा थी.
@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U.P.)
Mo.no.7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
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