कहानी----( आर्ट गैलरी )
रविवार होनें कि वजह से आज मेरे ऑफिस की छुट्टी थी. अतः मैंने शनिवार को ही अखबार में पढ़ा था कि इस समय दिल्ली की आर्ट गैलरी में, देश के तमाम प्रसिद्ध रंग कर्मियों की पेंटिंग की राष्ट्रीय प्रदर्शनी लगी हुई है.जो रविवार को भी अन्य दिनों की तरह ही खुला रहेगा. यानी कि सुबह 9 बजे से लेकर दोपहर 1 बजे तक और शाम 4 बजे से लेकर रात्रि 8 बजे तक खुला रहेगा.
मैंने उस दिन सप्ताह भर के सारे पेंडिंग पड़े हुए काम को निपटाया और करीब दोपहर 12:00 बजे के आस-पास खाली हुआ, खाली होने के बाद मैंने हल्का-फुल्का भोजन करके 3 घंटे तक आराम किया फिर इसके बाद उठकर जल्दी जल्दी तैयार होकर दिल्ली की आर्ट गैलरी देखने के लिए अपनी कार से चल पड़ा.
आर्ट गैलरी पहुंचने के बाद हमने अपनी कार को पार्किंग में खड़ी करके,जैसे ही आगे बढ़ने कि कोशिश की तो मुझे लगा कि किसी ने मुझे पीछे से आवाज़ दी है. मैंने जब अपनी गर्दन घुमाकर उस आवाज़ देने वाले की तरफ देखा तो एक आदमी दौड़ता हुआ सा मेरे पास आया और बोला साहब! मैंने उसके पहनावे से ही यह अंदाजा लगा लिया कि वह वहां कार पार्किंग के लिए ही लगाया गया है,उसने मुझे कार पार्किंग का टोकन देकर बोला कि साहब अब आप आर्ट गैलरी में जा सकते है. फिर इसके बाद उसने मुझे एक कड़क सलामी मारी,यह शायद उसने इस उम्मीद में मारी थी कि जब मै यहां से लौटूंगा तो उसे कुछ रुपए टिप के रूप में थमा दूंगा.
जब मैंने आर्ट गैलरी में प्रवेश किया, तो दंग रह गया क्योंकि वहां औरतों और आदमियों के साथ, युवा और बच्चों कि भी अच्छी खासी भीड़ थी और सभी जो उस आर्ट गैलरी में आए हुए थे, उन सभी के आकर्षण का केंद्र एक ही लाइन में करिने से लगी हुई, एक ही कलाकार की सारी पेंटिंग थी.जिसे सभी लोग मंत्रमुग्ध हो देख रहे थे और सभी के मुंह से हर 2 मिनट पर वाह-वाह निकल रहा था. साथ ही कुछ लोग कह रहे थे क्या अद्भुत कला है. जैसे हर पेंटिंग बोल रही हो. पेंटिंग और कलाकार की इतनी तारीफ सुनने के बाद मैं खुद को उस पेंटिंग को देखने से नहीं रोक पाया.
ज्यों हि मैंने पहली पेंटिंग देखी तो मुझे ऐसा लगा कि जैसे मेंरे सारे होशो-हवास उड़ गए हों.मुझ पर जैसे कोई जादू सा हों गया हों. वाकई मैंने आज तक उंगलियों और रंगों की इतनी बेहतरीन कला कभी भी किसी भी कैनवास पर नहीं देखी थी.वे तो मुझे तब होश आया जब माइक से मैंने किसी एंकर को यह कहते हुए सुना कि लेडीज एंड जेंटलमैन मुझे यह बताते हुए अपार खुशी और प्रसन्नता हो रही है, की अब आप सभी के सामने, इस आर्ट गैलरी में जिस आर्ट को आप सभी ने खुब सराहा और इतनी इज्जत दी है,मैं उस पेंटिंग को अपनी उंगलियों कि कला और रंगों से जान डालने वाली,उस महान कलाकार उर्वशी शर्मा को आप सभी के सामने इस मंच पर बुलाता हूं.
तभी पुरी आर्ट गैलरी तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठी. मैंने पेंटिंग देखने के बाद जब उसके बनाने वाले का नाम बगल में पढ़ा तो दंग रह गया क्योंकि जिस पेंटिंग कि कला को मैंने इतनी देर तक अपनी सुध-बुध खोकर देखा था, वे कोई और नही बल्कि उर्वशी शर्मा की ही थी. अतः मैं भी झट एक खाली कुर्सी देखकर वही बैठ गया, मेंरे बैठने के थोड़ी देर बाद ही उर्वशी शर्मा जब स्टेज पर आई तो, मेरी खुशी का कोई ठिकाना ना रहा और मैं भावना के अतिरेक में ताली बजाने लगा. तभी मेंरे बगल बैठे एक सज्जन ने कहा अरे! कब तलक ताली बजाएंगे आप.
मैं उसकी यह बात सुनकर झेंप गया दरअसल सभी ताली बजा रहे लोग, अब ताली नही बजा रहे थे, बस मैं अकेले ही ताली बजा रहा था. दरअसल उर्वशी शर्मा थी भी बिल्कुल अपने कला कि तरह खुबसूरत, जैसे मालिक ने उसे अपने प्रकृति कैनवास पर बनाकर भेजनें से पहले अपनी सारी कला को रंगों के रंगदान में खुब और काफी देर तक अपनी रंग कुचिका को डुबाया हों,मैं मन ही मन उर्वशी के उस रूप और लावण्य पर वाह! वाह! कह रहा था.
उर्वशी ने सफेद सलवार सूट और दुपट्टा पहना हुआ था. वह बड़ी ही मासूमियत के साथ स्टेज पर खड़ी थी तभी एंकर ने कहा कि,अपनी कला को कैनवास पर उतारकर उसे अपने भावों कि कुचिका से जुबान देने वाली उर्वशी शर्मा को भगवान ने बस एक चीज़ नही दी वे है, उर्वशी शर्मा कि जुबान. अतः उर्वशी कि बातो और उसके भाव को समझने के लिए मैं उनकी माँ से अनुरोध करता कि वे स्टेज पर आए और वे उर्वशी के भावों और उसके उदगार से हम सभी को अवगत कराए.
इतना सुनने के बाद जैसे मेरे नीचे से जमीन खिसक गई हों. एक अजीब सा दर्द उठा जो क्षणभर को और मेरी आँख को नम कर गया. फिर खुद को थोड़ा सामान्य कर मैं उर्वशी कि माँ को सुनने लगा उन्होंने बताया कि मेरी प्यारी बेटी उर्वशी जन्म से ही गूँगी है.भगवान ने सब कुछ दिया बस एक कमी रह गई, इस कमी शब्द को उच्चारित करने के बाद जैसे उनका गला भर आया हों, फिर उन्होंने उर्वशी कि तरफ देखा और मुस्कुराकर जैसे कहा हों कि तुम बोलो बेटी फिर उर्वशी करिब 25 मिनट तक बोलती रही और उर्वशी कि माँ उसकि सारी बातो को माइक के माध्यम से सभी को समझाती रही, फिर अंत में तालियों के साथ उर्वशी और उसकी माँ स्टेज से उतर गई और फिर पूरी आर्ट गैलरी खाली हो गई, लेकिन मैं फिर भी काफी देर तक कुर्सी पर बैठा रहा जैसी मेरी इच्छा अब घर जाने की नही हों रही थी , लेकिन फिर भी मैं वहां से उठा, और आर्ट गैलरी से बाहर निकल कर कार पार्किंग वाले को अपनी कार का टोकन देकर मैं कार ड्राइव करके अपने घरआ गया.
लेकिन घर आने के बाद भी मुझे उस दिन ठीक से रात में नींद नहीं आई मुझे लगा कि हों ना हों पक्का मुझे उर्वशी से प्यार हों गया है. मैं दुसरे दिन ऑफिस से खाली होने के बाद फिर अपनी कार से आर्ट गैलरी की तरफ चल पड़ा. करीब इसी तरह 3 दिन लगातार जाने के बाद मुझे पता चला कि बस 2 दिन और यह प्रदर्शनी रहेगी. इतना जानने के बाद मेरी बेचैनी और बढ़ गई, मैंने बहुत प्रयास करने के बाद उर्वशी के घर का पता लगाया तो मुझे यह मालूम हुआ कि उर्वशी और उसकि माँ, दिल्ली के आनंद विहार कॉलोनी में ही रहती है.
फिर मैं, दो दिन आर्ट गैलरी न जाकर इस उधेड़बुन में लगा रहा कि आखिर मैं कैसे उर्वशी की माँ से उसकि और अपनी शादी की बात करूँ या फिर मैं कैसे अपनी मम्मी-पापा से अपने शादी कि बात करूँ. दरअसल मैं अपने घर में एकलौता था मेंरे पास ना कोई बड़ी बहन, ना बड़े भाई ना ही कोई बड़ी भाभी थी, जिनसे मैं अपने शादी कि पहल करने कि बात कर पाता. ऐसे में मेरे मन में एक डर था,कि कही मम्मी-पापा इस शादी से इसलिए ना मना कर दे कि उर्वशी गूँगी है.
लेकिन कहते है कि मोहब्बत जो ना कराए कम है. ऐसा मेरे साथ भी हुआ और मैं बड़ी हिम्मत करके एक दिन उर्वशी के घर पहुंचा और उसके घर के दरवाज़े पर लगे डोरबेल पर अपनी उंगली रख दी. थोड़ी देर बाद भीतर से आवाज़ आई कौन? मैं झट पहचान गया कि ये उर्वशी के मम्मी कि आवाज़ है, मैंने कहा जी मैं आलोक. कौन आलोक इतना सुनने के वाद एक बारगी मेरे पूरे शरीर में एक झुरझुरी सी उठी. अतः मैंने फिर डोरबेल बजाया क्योंकि दुसरी बार आलोक कहने कि मेरी हिम्मत ना रही.
लेकिन इस बार दरवाजा खुला, तो उर्वशी कि माँ ने कहा जी कहिए! आपको किससे मिलना है? मेरा शरीर इस समय थोड़ा-थोड़ा काँप रहा था. फिर भी किसी तरह अपनी लड़खड़ाती जुबान से कहा जी- हमें आप से ही मिलना और बात करना है.ठीक है आइए! बैठिए, जब सोफे पर बैठ गया तो मेरे हिम्मत में भी थोड़ा सा इजाफा हुआ. मैंने बिना उनकी तरफ देखें,अपने दिल कि पूरी बात उर्वशी के माँ से कह दी. लेकिन सर झुकाए रहा. करीब 20 मिनट बाद उर्वशी कि माँ ने कहा बेटा! उनके बेटा कहते ही मैंने अपनी निगाह उठाकर उन्हें देखा तो उन्होंने कहा.
कि तुम उर्वशी के बारे में जानते हों. तो मैंने कहा कि हाँ!जानता हूं, फिर भी तुम उससे अपने शादी कि बात कर रहे हों. माँ जी! मैंने आपसे कुछ भी छिपाया नही है, ना ही कोई मैंने आपसे झुठ बोला है. मैं सचमुच उर्वशी से प्यार करता हूं और मैं उसके जीवन को अपने प्यार और चाहत कि जुबान देना चाहता हूं. प्लीज!आप मना मत करिए.मैं आपके पाँव पड़ता हूं, इतना कहते ही अजय उनकी पाँव में गिर पड़ा. उर्वशी कि माँ ने कहा कि अरे! अरे! ये तुम क्या कर रहे हो बेटा.
उन्होंने आलोक को उठाया और अपने गले से लगा लिया.गले से लगाने के बाद वे बोली ठीक है बेटा.मुझे कोई आपत्ति नही, हाँ! अगर तुम्हारें माँ-बाप को हों तो और बात है. इतना सुनते ही आलोक जैसे बावला हों गया हों.किसी तरह अपनी खुशी को कंट्रोल करने के बाद उसने देखा कि उर्वशी ने उसके और उसकी माँ के बीच हुई जैसे सारी बाते सुन और समझ ली हों. उसे तब और विश्वास हों गया, जब उसने अपनी माँ के कहने पर चाय और पानी लेकर उस कमरें में आई और देकर जाने लगी तो उसकी माँ ने कहा,- बेटी उर्वशी! तुम भी चाय लेकर हमारे पास बैठो. तो उर्वशी एक और कप में चाय लेकर अपनी मम्मी के बगल के सोफे पर जाकर बैठ गई. बैठने के बाद उर्वशी कि माँ ने उससे सभी बाते बता देने के बाद पुछा, बेटी उर्वशी! तुम्हें आलोक पसंद तो है ना?इतना पूछते ही जब उर्वशी शर्मायी तो उसकी माँ सब समझ गई. क्योंकि उन्हें बचपन से अपनी उर्वशी कि भाषा का पता था.
फिर आलोक ने सब-कुछ अपनी मम्मी-पापा से बता दिया और उसके मम्मी-पापा यह सुनकर बहुत खुश हुए और कहा कि आलोक आज तुम्हें अपना बेटा कहते हुए हमें गर्व हों रहा है.फिर इसके बाद हमारी और उर्वशी कि शादी पूरे धूम-धाम से हुई, इतना ही नही हमने अपने मम्मी-पापा से इजाजत लेकर उर्वशी कि माँ को भी अपने साथ रहने के लिए तैयार कर लिया.शादी कि पहली रात जब मैं उर्वशी के पास पहुंचा तो शर्माई सकुचाई छुईमुई सी उर्वशी घुघट काढ़े बैठी थी.
मैंने जब उर्वशी का घुंघट खोला तो चौक गया क्योंकि उर्वशी कि आँखों से आँसू बह रहे थे. मैं डर गया कही उर्वशी इस शादी से दुखी तो नही है. मैंने किसी तरह उर्वशी से पूछा कि उर्वशी क्या तुम अपनी इस शादी से खुश नही हों? तो, उर्वशी मेंरे सीने से लगकर कुछ देर तक सिसकती रही, फिर उर्वशी ने एक कागज़ पर अपने दिल का लिखा एक पन्ना मेरी हाथों में पकड़ाया जिसे मैं अपनी एक सांस में पढ़ गया.पढ़ने के बाद मैंने कहा पगली फिर उसके आँसू पोछकर बोला मैं कोई देवता-वेवता नही बल्कि तुम हमारे प्रेम और मोहब्बत कि देवी हों.
हमारी शादी के 4 वर्ष बाद एक बार फिर दिल्ली कि उसी आर्ट गैलरी में, वैसी ही प्रदर्शनी लगी, लेकिन इस बार इस आर्ट गैलरी की सबसे बड़ी उपलब्धि थी उर्वशी शर्मा का इसी आर्ट गैलरी में टंगी वह पेंटिंग जिसमें "एक गुंगी दुल्हन जब सुबह के धुंधलके में अपने कमरें कि खिड़की को खोलकर बाहर कि तरफ देखती है,तो जैसे खिड़की के रास्ते से होकर कमरें में आती हुई रश्मिया उससे बात करना चाह रही हों,और वे दुल्हन जैसे रात भर अपने पिया से बात कर थकी हों. इसलिए वे उन रश्मियों को बस देखेगी पर उनसे कोई बात नही करेगी."
इस पेंटिंग का चयन इस बार पद्मश्री के लिए किया जाता है. यह समाचार जैसे ही टेलीविजन और दूसरे दिन के अखबार में वायरल हुआ तो जैसे आलोक और उर्वशी के घर पूरी दिल्ली उमड़ पड़ी हो. बधाइयो का तांता लग गया. जब इन सब से उर्वशी और आलोक खाली हुए तो रात काफी हों चुकि थी. अतः वे दोनो जब अपने कमरें में पहुंचे तो आलोक ने उर्वशी से अपनी आँखें मुंदने के लिए कहा, और उसने अपनी आँख मुंद ली.
फिर कुछ देर बाद जैसे आलोक ने उसकी हथेली पर कुछ रखा हो.रखने के बाद कहा कि उर्वशी अब तुम अपनी आँख खोल सकती हों. इतना सुनने के बाद उर्वशी ने जब अपनी आँखें खोली तो दंग रह गई. उसका कारण था, उसकी हथेलियों पर एक प्यारे से गुलाबी डिब्बे में करके करीने से रखी हुई हीरे की खूबसूरत सी अंगूठी, उसे डिब्बे से निकालने के बाद उर्वशी ने अपनी कोमल ऊँगलिया आलोक के सामने कर दी .
जिसमें प्यार से अंगूठी पहनाते हुए आलोक ने कहा कांग्रेचुलेशन माई लव! इतना सुनते ही उर्वशी,आलोक के सीने से लग गई. जैसे कह रही हों,लव यू आलोक! ये तुम्हारी देन है अगर तुम ना चाहते तो,मै कभी भी दोबारा कैनवास पर कुछ उतार ना पाती और आलोक ने भी जैसे अपनी उर्वशी से कहा हों, कि तुम हमारे दिल के आर्ट गैलरी में केवल एक जन्म तलक ही नही बल्कि कई जन्मो तक यूहीं टंगी रहोगी उर्वशी.
यह कहानी मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है.
दिनांक-11/5/21
लेखक-- रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no. 7800824758
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