कमरे में रखी आलमारी को अक्सर मैं तन्हाई मे जब उसके याद की इंतहा या हद होती है, तो खोलता हूं. वे आलमारी महज एक आलमारी नही, बल्कि हमारे और रुखसार के मोहब्बत की वे तमाम खट्टी-मीठी यादें व उसकी जुदाई का वे आखिरी ख़त भी है जो रुखसार ने अपनी भीगी आखों व थरथरती हाथों से मुझे थमाया था.
उस ख़त को मै महज रुखसार का आखिरी ख़त नही मानता, उसे मै अपनी जुदा होती हुई रुखसार के कदमो की वे आवाज मानता हूं जो आखिरी ख़त के साथ जाती हुई रुखसार के कदमो से आंसुओ की तरह इस आखिरी ख़त के हर हर्फ से आती है. फिर रुखसार ख़त के आखिर मे नुमाया होती है और कहती है--"आदिल क्यों खुद को मेरी याद मे रुला व तड़पा रहे हो, प्लीज किसी से निकाह कर अपनी दुनिया बसा लो ".
फिर रुखसार को छूने की चाह मे जब अपने हाथ बढ़ाता हूं तो वही हमेशा की तरह--"उसका आखिरी ख़त मेरे हाथों से छू जाता है".फिर खुली खिड़की से हवा के तेज झोंके ने मुझे कमरे की आलमारी की तरफ जाने और रुखसार के उस आखिरी ख़त को संभालकर रख देने के लिए मजबूर कर दिया हो. सच मैं मोहब्बत मे कितना बद--नसीब निकला जिस "रुखसार के साथ रहने और घर बसाने का ख्वाब देखा था आज उसी रुखसार की याद आलमारी और उसका दिया आखिरी ख़त ही मेरे पास रह गया".
यह लघुकथा मेरा स्व-लिखित व अप्रकाशित है,
लेखक--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी, मियांपुर
जिला-जौनपुर pin. no. 222002 (U P)
Mo. no. 7800824758
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