Tuesday, 8 November 2022

(बाँसुरी का बचपन)
तलाश रही हूं-----------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
तलाश रही हूं----------
उड़ती तितलियाँ इस फूल से उस फूल,
और उन फूलो की पाँखुरी का बचपन।
बहुत पिछे छुट गया उम्र के साथ------
माँ की बाधि चुटिया और फ्राक पहने स्कूल जाना,
वे रास्ते में बुढ़ि दाई की अमरुद,
और जुम्मन चाचा के चुरन!
कुछ सिक्के हथेली के कितने ज्यादा थे,
अब यादो में है जैसे---------
एक परी का बचपन।
तलाश रही हूं---------
आज फिर मायके से ससुराल जाते,
अचानक नजर थम गई कुछ पल उस मोड़ पे-----------
जहां से कभी खरीदा करती थी गुब्बारे और बाँसुरी,
आज वे फेरीवाला नही दिखा,
एक हूक उठी---------
और मेरे अंदर यादो की आँख भर आई,
अब ता उम्र कचोटेगा मेरी यादो में------
वे गुब्बारे और बाँसुरी का बचपन।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758

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