Rangnath Dubey's Poems
Tuesday, 8 November 2022
(माँ)
माँ-
मै ढ़ेरो खाता हूँ,पर तेरी
चुपड़ी रोटी की भूख-
रह जाती है.
आज सबकुछ है,
स्लीपवेल के गद्दे,एसी कमरे
पर नींद-
घण्टो नही आती है.
ऐ रंग यादो मे सिर्फ--
माँ की गोद,
और लोरी रह जाती है.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
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