Wednesday, 30 November 2022

(खनकती ये महबूब चुडियां)
मै अक्सर नमाज़ के वक़्त भी घुम जाता हूं,
मस्जिद के बगल से जो गुजरती है------
चंद चुडिहारो की गली!
तकता हु तमाम दुकानो की तरफ,
कि शायद किसी दुकान पे--------
फिर अपनी नर्म नाज़ुक सी कलाई में,
पहनती किसी चुडिहार से चुड़िया--वे दिख जाये,
जैसे दिखी थी अगले जुमें को!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यो घुमा------------
तो नज़र पड़ी वे आ रही थी कुछ सहेलियो के संग,
तभी उसकी चुड़ियो की खनक ने,
जैसे हमें आदाब कर कहा हो,
जनाब मै इसी शहर की हूं!
और इसी शहर की है मेरी कलाईयो मे-----
खनकती ये महबूब चुड़िया।

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