Monday, 21 November 2022

(मै यहां रोने आता हूं)
तुम्हे पाने और खोने आता हूं,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।
बनाता हु घरौदा फिर तोड़ देता हु,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हु।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम-----
मै यहां धोने आता हु।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहां कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे--------
तेरी निशानियो के सिरहानें सोने आता हु।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हु,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी,
मै यहां तेरा होने आता हु।
तुम्हें पाने और खोने आता हूं-------
अब हर शाम मै यहां रोने आता हु।

@@@रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.--7800824758

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