(अयोध्या आँख में आँसू लिये खड़ी थी)
कल बड़ी मनहूस घड़ी थी,
पुरी अयोध्या
आँख में आँसू लिये खड़ी थी.
ना राम मंदिर ,ना बाबरी मस्जिद,
सभी शरीक थे उस हूजुम में,
जैसे किसी छत पे---
माँ सीता भी,
हाशिम के लिये खड़ी थी.
रामनवमी और दशहरे की रामलीला,
का किरदार था उनमें,
वे बस वादी थे---
वरना उनमें सरयू का वज़ु था,
ता उम्र उन्होनें,
अपने ज़ुम्मे की नमाज़ ए,"रंग"
मुल्क की तरक्की,अमन
और मोहब्बत के लिये पढ़ी थी.
कल बड़ी मनहूस घड़ी थी---
पुरी अयोध्या
आँख में आँसू लिये खड़ी थी.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी, मियांपुर
जौनपुर.
Mo.no.7800824758
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