उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
आम-अमरुद,बरगद,पीपल और
दरवाजे पे लगे
नीम के छाँव की थी.
उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
साथ मे घुमना
और घंटो टहलना,
खेत की पगडंडियो पे चलना,
सच ए शहर--
बीना स्वार्थ और मतलब के
कितनी पाकिज़ा दोस्ती,
हम दोनो के गाँव की थी.
उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
कितनी डांटे सही,
कितनी शिकायते सुनी,
माँ के चाटे खाये-
फिर भी चोरी से मिलते रहे दोनो,
क्योंकि वे दोस्ती
हम दोनो के बेइंतहा लगाव की थी.
उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
कंचे खेले,
आम के बाग से अंबिया तोड़ी,
साथ पोखर नहाए
दोस्ती के वे सारे मखमली दिन
छिन गये,
रोटी की हत्तक मे
कहाँ से कहाँ चले आए,
ए "रंग"
याद इसलिए है जेहन को,
क्योंकि वे दोस्ती,
हम दोनो के
दो जिस्म
मगर एक जान की थी.
उसकी और मेरी दोस्ती
कागज़ के नाव की थी.
यह कविता मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P )
mo.no.------7800824758
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