(तलाक़ था)
औरत अगर बगावत न करती,
तो क्या करती----
जिसने अपना सबकुछ दे दिया, तुम्हें,
उसके हिस्से----
केवल सादे कागज़ पे लिखा,
तीन मर्तबा तलाक़ था.
इस्लाम और सरिया की ,
इज्ज़त कब इसने नहीं की,
फिर क्यों ?आखिर ----
केवल मर्दों के चाहे तलाक़ था.
मैं हलाला से गुजरू और
सोऊँ किसी गैर के पहलू,
फिर मुझे वो छोड़े----
उफ ! मेरे हिस्से में ,
ऐ खुदा ! ----
कितना घिनौना तल़ाक था.
महज मेहर के रकम से कैसे?
गुजारती जिन्दगी,
दो बच्चे मेरे हिस्से देना,
आखिर , मेरे शौहर का ,
ये कैसा इंसाफ़ था.
मैं पुछती हूँ, बताओ--
मस्जिदों और खुदा के आलिम़-हाज़िल,
कि आख़िर-----
मुझ बेगुनाह को छोड़ देना ,
कुरान की किस ----
आयत का तलाक़ था.
रचनाकार -- रंगनाथ द्विवेदी
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