(बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ)
कल शहीद----------
की चीता जला रहा बाप रो रहा था!
तभी किसी ने उसके कंधे पे हाथ रखा,
तो वे चीख पड़ा-----------
कि रहने दो मेरे कंधे पे मत रखो,
इस देश के ये नपुंसक हाथ जरुरत नही।
गर इतनी ही सहानुभूति है मेरे शहीद बेटे से,
तो कहो देश की सियासत से---------
कि ला दे उन तमाम नक्सलियो के कटे हाथ,
नही ला सकता न जानता हूँ।
इसी जगह फिर सजेगी---------
कुछ फौजी बज़ायेंगे मातमी धुन,
और अपने शहीद बेटे की चीता को आग देगा------
किसी बुढ़े पिता का कंपकपाता हाथ।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
7800824758
छतीसगढ़ मे शहीद सी आर पी यफ के उन जवानो को मेरी श्रद्धांजलि।
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