विरह की सेज है,सिलवट है
करवट उदास है.
कि चले आओ परदेश से,
कंगन उदास है.
जब से तुम गए हो,
तब से मैं,
ना सजी,ना संवरी
यहां तलक कि कमरे का
दर्पण उदास है.
कि चले आओ परदेश से,
कंगन उदास है.
पांव से निकाल कर के
रख दिया मैंने
आपके पसंद की
वे घुंघरूओ वाली पायल,
मै फिर से
पहन के थिरकूंगी
अभी तो उस पायल की
छन-छन उदास है.
कि चले आओ परदेश से
कंगन उदास है.
सर्वाधिकार सुरक्षित.
@@ Rangnath dwivedi
mo.no.7800824758
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