इस ओलंपिक में
लग रहा कि जैसे
दौड़ रहे है
फिर से मेजर "अपनी हॉकी
और गेंद के साथ
उस तरफ
जहा कोई गोल बाकी है."
सावधान!
ऐ विश्व ओलंपिक
तेरे अहम के जबड़े कसे है
ढीला छोड़
अभी इंग्लैंड सिसका है
रोया है
यह तो कुछ नही
सिर्फ,एक झांकी है
अभी चक दे नही कहेंगे
ये भारत के शेर
क्योंकि इन्होंने अपनी खुशी
शायद! गोल्ड तक नापी है
मेरे खयाल से
यह भारत की नई हाकी है
यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है
रचयिता--रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियापुर
जिला-जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
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