(एक कफन सादी बुनती थी)
वे चरखे से,,
खादी बुनती थी.
कभी हसती थी,कभी गाती थी
वे आधी-आधी रात
गोरों के खिलाफ
बंद कमरे में,सूत कातकर
इंकलाब की
मुनादी बुनती थी.
वे चरखे से,,,,
खादी बुनती थी.
कई बार जेल गई
वहां भी उसने चरखा मांगा
लेकिन
मना कर दिया गया उसे
क्योंकि वे रात में "भगत सिंह
और दिन में गांधी बुनती थी."
वे चरखे से,,,
खादी बुनती थी
वे युवा थी
उसने सेज कुंवारे रखे
लेकिन पहचानती थी,
वे पिया को खूब अपने
जिसकी आंखों में
लाल डोरे नही
आजादी थी.
वे उसकी और अपनी
बारात के लिए
पगली "एक कफन
अलग से सादी बुनती थी."
यह रचना मेरी स्व–रचित और प्रकाशित है.
रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जौनपुर 222002 (U P)
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