Tuesday, 8 October 2024

(चिट्ठी)

मैं भला
कैसे भूल सकती हू
जब हर रोज दरवाजे पर
मैं घंटो खड़ी रहती थी
डाकिए 
को सारे गांव की चिट्ठियों का गट्ठर
अपनी साइकिल पर टांगे
बाटने के लिए
आते हुए देखने के लिए इस उम्मीद से
की शायद
वह अपनी साइकिल खड़ी कर
अपने चिट्ठियों के गट्ठर से
तुम्हारे प्यार की चिट्ठी निकाल
मुझे थमा
जैसे ही जाने को होता
तो इच्छा होती की उससे कह दू
कि जरा उनकी लिखी चिट्ठियां
थोड़ी और जल्दी दे जाया करो
फिर खुद को तुम्हारे चिट्ठियों के
प्रेम की बावली
समझ, खुद को धत कहती
और उस चिट्ठी को लेकर
बिस्तर के तकिए को सीने से लगाकर
कुछ देर
तुम्हारी चिट्ठियों को देखती 

जब तुम्हारे प्रेम की चिट्ठियां डाक से आती थी,
सच उस चिट्ठी को खोलने से पहले मेरी नज़र
उस चिट्ठी से चिपके

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