Monday, 5 May 2025

(बेरोजगार एक अनकहा दर्द)

(बेरोजगार _एक अनकहा दर्द)
मै रोज चढ़ता हूँ--------
इस महानगर मे देने इंटरव्यूव की सीढ़ियाँ!
पर;ऐ रंग ------------
मेरी हार की सलीब पे,
लटक जाती है,मेरी डिग्रियाँ।
ये बेरोजगारी का भयावहपन और घुटन !
फिर वही इंटरव्यू------------
और मेरे हताश लौटते कदमो पे,
कहकहे लगाती---------
महानगर के दफ्तरो की सीढ़ियाँ।

@@@रंगनाथ द्विवेदी।

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