Wednesday, 28 May 2025

(चरागो की रात)

(चरागो की रात)
लफ्ज़ो की नदी मे घिर गई है किश्ती,
मै कहा ढ़ुढू----------
है कहाँ किनारो की रात।
ना कोई दर,ना ठौर,ना ठिकाना 
कैसे लिखू कि---------
कहाँ गुजरी है मेरे बहारो की रात।
महकते फूलो की खुशबू ना रास आ रही,
कितनी मनहूस लग रही है---------
चमकते सितारो की रात।
एक सिलसिला लिये है गम जो ना खत्म हो रहा,
कैसे लिखू---------
बजती बाँसुरी और पहाड़ो की रात।
वे कहकशे,वे शायरो की महफ़िल छिन गई,
अब याद है बस----------
कुछ मुशायरे की रात।
तु लौट आ एै दिल उस आसमा से,
तेरे इंतज़ार में है-------
किसी के चरागो की रात।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758

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