(प्रिय मित्र डॉ. रत्नाकर के असामयिक निधन पर)
कल तक जिनके शब्दों में जीवन था,
जिनकी मुस्कान हर दर्द को हल्का कर देती थी,
वो डॉ. रत्नाकर,
आज हमारे बीच नहीं हैं।
कंधों पर हाथ रखकर
जो हर बार कहते थे,
“सब सम्भल जाएगा, हिम्मत रखो,”
आज वो खुद
हमें हिम्मत देकर चले गए।
किसे पता था कि
हमारी हँसी-ठिठोली,
चाय की प्यालियों के बीच
जिन बातों में दुनिया रंगीन लगती थी,
वो पल
इतनी जल्दी स्मृति बन जाएँगे?
रत्नाकर,
क्या तुम्हें पता था
तुम्हारी मौजूदगी हमारे लिए
कितनी अनमोल थी?
क्या तुम्हें अहसास था
कि तुम्हारी आवाज़
हमारे दिनों की रौशनी थी?
क्या तुम्हें पता था, मित्र?
कि तुम्हारी मुस्कुराहटें
एक दिन हमारे लिए
सिर्फ़ तस्वीरों में रह जाएँगी?
कि तुम्हारी हंसी
सिर्फ़ यादों में गूंजेगी?
हम तो बस यही सोचते थे –
जब सब बिछड़ेंगे,
तो उम्र, समय, और थकान के हाथों,
धीरे-धीरे,
बारी-बारी।
लेकिन तुम तो
बीच रास्ते में ही
हम सबको छोड़कर चले गए।
किससे शिकायत करें?
किसे दोष दें?
क्योंकि मौत का कोई हिसाब नहीं होता,
कोई समय तय नहीं होता।
अब हम सब यहाँ,
तुम्हारे नाम के आगे
"स्व." लगाकर
अधूरे से लगते हैं।
तुम्हारी हँसी,
तुम्हारी सलाहें,
तुम्हारा हाथ थामकर कहा गया
“मैं हूँ ना” —
सब अब बस यादों की धरोहर हैं।
हम जानते हैं,
जीवन की रेखा सीधी नहीं चलती,
कोई न कोई पहले बिछड़ता है,
कोई पीछे रह जाता है।
लेकिन रत्नाकर,
तुम्हारा जाना
हमारे लिए
सिर्फ एक विदा नहीं,
एक खाली जगह है
जो कोई भर नहीं सकता।
हम सब
एक दिन तुम्हारे पीछे चल पड़ेंगे,
बारी-बारी,
लेकिन जब तक साँस है,
तुम्हारी यादों को
अपनी हँसी और आँसुओं में सँजोए रखेंगे।
तुम्हारी याद में,
नीरज कृष्ण
(नोएडा.... 26 मई 25)
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