(मै यहां रोने आता हू)
तुम्हे पाने और खोने आता हू,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हूं।
बनाता हू घरौदा फिर तोड़ देता हू,
मै यहां समंदर की लहरो मे,
खुद को हर शाम-----------
डुबते सूरज की तरह डुबोने आता हू।
तु गई तेरी याद रह गई,
उसी याद की लाश को हर शाम------
मै यहां धोने आता हू।
नींद और सुकून भी मेरी आँखो मे अब नही,
मै यहा कुछ लम्हे रेतीली कब्र पे-------
तेरी निशानियो के सिरहाने सोने आता हू।
मै तब भी पागल था और अब भी पागल हू,
तभी तो तेरी जुदाई के इतने सालो बाद भी-------
मै यहां तेरा होने आता हू।
तुम्हें पाने और खोने आता हू,
अब हर शाम मै यहां रोने आता हू।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
##एक लम्बे अर्से बाद कागज़ पे तड़पती मोहब्बत के कुछ आँसू हमारी कलम से गिरे है अखबार मे छपने पे कटिंग तो लगाई पर स्पष्ट न था सोचा कुछ दिलो की टिस हरि कर दी जाये,उम्मीद है कि ये दर्द आप सभी को रास आयेगा,शुक्रिया।
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