(हे!सुरुज देव)
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव,
सबपे लुटाना अपना प्यार हे!सुरुज देव।
नदिया के पानी में जब माँग भरे दुल्हन,
अँजुली से अरघ दे-----------
तो सुनियेगा सबकी पुकार हे!सुरुज देव!
क्या आरा,क्या छपरा,क्या बिहार हे!सुरुज देव।
गुँजे किलकारी घर और आँगन में------
हर आँचल में भरना ये दुलार हे!सुरुज देव।
भले पुरे साल नही लौटते है गाँव,
पर तेरी खातिर आते है लेके परदेश से-----
अपना पुरा का पुरा परिवार हे!सुरुज देव।
मांगते है कविता और गीत की नदी में हम,
दे शब्द अरघ आपसे-----------
कि रहे खुशहाल ये संसार हे!सुरुज देव,
और अमर रहे धरती पे--------
डाला छठ का ये त्यौहार हे सुरुज देव।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.7800824758
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