Thursday, 15 November 2018

सारे बसंत मै सजु

(सारे बसंत मै सजु)
बीसो बसंत मै सजी---------
पोर-पोर गदराई खुद को देख-देख,
बीसो बसंत मै सजी।
कोयल हुई बाँवरी-------
बागो में कूक-कूक कर,
भँवरा हुआ पागल महुये को चुमकर,
मेरे अधर कुँवारे,
मै कुँवारी अंग-अंग--------
बीसो बसंत मै सजी।
यौवन कलश छलके बूँद-बूँद कर,
आँखे हुई बाँवरी,
मेरी पिया दरस को,
हे!बसंत सखी अब तुम-----
कोई एैसी बान मारो कि आये बाबुल के गाँव,
मेरे पिया की डोली,
और मै बैठ चलु उसमे अपने पिया के गाँव,
बीसो बसंत मै सजी।
वे घूँघट उलट के देखे मै शर्म से गडु,
और उनके छुवन की सिहरन,
से कांपे अधर मेरे,
और उस कंपकपी की रात को,
अपना कौमार्य सौप उनको,
फिर अपने प्यार और उनके प्रित की-----
सारे बसंत मै सजु।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-------7800824758

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