(नई मासूम निर्भया )
निर्भया--
जो चीखी,तड़पी,छटपटाई
उफ !-----
तेरी विकृत कुंठा के डाले गये वे सरिये,
कितने घृणित थे!
काश तुम्हारी माँ ने कहा होता,
या तुमने----
अपनी सगी बहन के
वे गुप्तांग याद किये होते,
तो तुम्हारा ज़मीर
तुम्हें रोकता कचोटता,
कि ये पाप है,अन्याय है
और तुम कांप जाते!
हां ये जरूर हुआ की तुम्हारी
पशुता व अमानवियता से,
निर्भया-----
कुछ ही दिनो मे मर गई,
लेकिन तुम नही मरें,
क्योंकि अगर तुम मरे होते,
तो कतई नही,
चीखती और तड़पती
हाथरस में,
एक नई मासूम निर्भया.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.------7800824758
यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित है।
No comments:
Post a Comment