भरपेट भोजन की थाली नही आई,
कुछ एैसे भी घर है----------
जहां दिवाली नही आई।
रो रही घर में---------
तक-तक के दरवाजे को भूखी बेटिया,
उन्हे अपनी माँ की बुलाती आवाज़,
प्यार भरी थपकी,
छोटी बिटिया के खुशीयो की------
वे ताली नही आई!
अभी तलक----------
लौट कर इस घर की दिवाली नही आई।
सुबह के धुधलके में--------
दो पुलिसिये चादर में लपेटकर,
लाये थे नग्न लाश!
बेटिया डर गई,
एकटक देखा कि कौन है?
फिर माँ कह झिंझोडा--------
लेकिन उसकी माँ की खुली आँखो ने तका नही,
पहली बार-उसकी माँ के चेहरे पे
कोई लाली नही आई।
ये बेटिया क्या जाने?
कि करोड़ो के पटाखो में दब गई,
इनके माँ की सिसकिया!
देख लो आज तुम भी मेरी कविता,
इसके बदन पे हवस के निशान-----
ये आज भी अपने घर खाली नही आई,
ये और बात है कि----------
इसके घर कोई दिवाली नही आई।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
----शायद कुछ एैसे वंचित घर है जहां दिवाली नही आती,फिर भी ईश्वर हर घर को रौशनी दे।
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