तुम पर गर्व है,फक्र है
ऐ नई संसद!
बहुत कुछ बदला समय के साथ
आखिर कब तलक पहनती
तू किसी और की दी हुई
भीख में,मिर्जई संसद.
उतार दे!
आ चल! अब नए चोले में
क्योंकि,ये कुनबा तेरा है,
संस्कार तेरे है
तू भारत है
और तेरी आत्मा है
यह नई संसद. ✍️✍️
यह रचना मेरी स्वरचित और अप्रकाशित है.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियांपुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
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