वे पोखर न रहा, वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे--------
पहली सी दिवाली न रही.
वे अगले जन्म घर के मासूम बच्चो को छछुंदर होने से,
बचाने के लिये,
घर मे एक बड़े से दियले मे--------
काजल पालने वाली काकी न रही.
वे उल्लास, वे पटाखे, थोड़े मे खुश हो जाना,
कितना सोंधापन था,
आज चाईनीज़ टिमटिमाते झालर जल रहे,
लेकिन उनमें---------
वे प्यार व छुअन कही बाकी न रही.
अब तो बस पथरायापन ही खुरचना है,
क्योंकि माँ के साथ बैठ,
कमरे मे एक-एक दिये मे तेल रखती,
हमारें गाँव की-----
रुपाली न रही.
वे पोखर न रहा,वे चाकी न रही
अब मेरे गाँव मे------
पहली सी दिवाली न रही.
@@@रचनाकार----रंगनाथ द्विवेदी.
जज कालोनी,मियाँपुर
जिला---जौनपुर पिन नं.222002 (उत्तर-प्रदेश)
Mo.no.7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
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