(राम वनवास मे थे)
राम अपनी ही अयोध्या में-
जैसे कैदियों की लिबास मे थे.
लंका फतह करके लौटे,
तो फिर सियासत की--
"आजीवन कारावास" में थे.
उफ! मेज दर मेज फाइले उलझी,
कचहरी मे "रावण की आत्मा" अट्हास करती लगी,
सच वे हमारे आस्था की पेशी थी,
जिसे कानून तारीख कहता है,
वरना हमारे राम---
टेंट मे नज़रबंद
और एक असह्य पीडा़ की
संत्रास मे थे.
ये दर्द ,ये तड़प,
ये सरयू के विलाप के आँसू
अब शायद थम जाये,
कुछ घंटे मे बदल जाये ये दृश्य,
क्योंकि आज न्याय के मीलार्ड गगोई,
के हाथो ए "रंग"
निर्णय की घड़ी है,
इस घड़ी के लिये हम,
न जाने कितने वर्षो से
इंतजार मे थे,
आईये हम शपथ ले उस राम की,
और ईट रखे फैसले की----
चाहे वे मस्जिद हो,
या फिर मंदिर हमारे राम की
क्योंकि राम-----
अपने भाई के लिये ही चौदह वर्ष,
वनवास में थे.
रचयिता---रंगनाथ द्विवेदी
जिला-जौनपुर.
Mo.no.7800824758
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