Wednesday, 1 November 2023

(शहर के लोग)

(शहर के लोग)
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग!
एै खिज़ा के पत्तो--------
तुम कभी मेरी कब्र पे गिरना।
कितनी मोहब्बत थी गुसलखाने से,
रहने नहीं दिये एक इंतकाले सब-----
बड़े बेमुरौवत निकले शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै मौसमें सावन--------
तुम कभी मेरी दफ़न-ऐ-बदन पे गिरना!
कभी शफ़क चाँदनी में टहलती थी,
घंटो जिस छत पे,
ले चले उसी छत वाली गली से-----
मेरा जनाज़ा मेरी शहर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये शहर के लोग।
एै चाँद वैसे ही शफ़क रातो की तरह,
मेरी इस रुहे बदन पे पड़ना,
मेरी तड़प है कि अब भुले से नही आते,
शहर तो शहर मेरे अपने घर के लोग।
मुझे नंगी सुला गये मेरे शहर के लोग।

@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758

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