(जवान बेटी काट रहे है)
अपने ही हाथ से हम वृक्ष नही,
बल्कि कुल्हाड़ी से--
एक जवान बेटी काट रहे है!
जिसे हमने इतने वर्षो--
अपना प्यार,
वात्सल्य और दुलार दिया,
आज उसी
बिटिया की अपने हम
एक-एक अँगुली काट रहे है!
रो रही है,सिसक रही है,
देख के
जैसे कह रही हो,कि
तुम इतना पथरा गये बापु,
आखिर क्यू?
आप यू मुझको दुत्कार रहे है,
एक जवान बेटी काट रहे है!
रहने दो,
हँसने और जिने दो,
अपनी इस बिटिया की
डाल और शाख को,
पत्ती-पत्ती रो रही,
देखो,सुनो बापु गौर से
जैसे कह रही हो कि,
क्यू आखिर?
अपनी इस बिटिया को--
अपने ही दरवाजे से
उजाड़ रहे है!
कुल्हाड़ी से-
एक जवान बेटी काट रहे है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
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