कुछ लोग साहित्य में एक दूसरे को बड़ा कहकर पीठ खुजा रहे हैं,,,खासकर व्यंग्य विधा में यह समस्या कोढ़ में खाज की तरह है,,,कुछ को तो आप पूरा पढ़ डालिए तो पता लगेगा की इसमें व्यंग्य कहा था, बस व्यंग्य की खींची लकीर को पीटना और नवधा प्रयोग से मूंह चुराना और बीच बीच में अपनी खीझ उतारना ही इनका बड़ा बनना रह गया है जबकि "व्यंग्य का प्राण तत्व उसकी रोचकता है इसलिए अब बड़े व्यंग्य को और बड़े लेखक को अपनी कुंठा से बाहर आना पड़ेगा,,,,
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