Thursday, 27 June 2024

मारिशस

मारिशस से किताब आया है। सात समुंदर पार वह मारिशस जहां मेरे पूर्वज गिरमिटिया मजदूर के रूप में ले जाए गये थे। जबरदस्ती अथवा मजबुरीवश। अपनो से बिछड़कर कैसे गये होंगे! 
शायद फिर मिलना न हो सकेगा। मैं उन्हें अपने अंतर्मन की आंखों से पढ़ने की कोशिश करता हूं। उनके दुख संताप को समझने की कोशिश करता हूं। 
जाते समय एक आस जरूर रही होगी अपने वतन अपने बंधु बांधवों के पास फिर से लौटने की पर निष्ठुर जालिम अंग्रेजों ने उन्हें अकेला उस विरान धरती पर छोड़कर कैसे चले गए! 
उस विरान अनजान बंजर भूमि पर हमारे पूर्वजों ने कैसे काटी होगी वह कष्टदायक जिंदगी। कितनी मुश्किलों का सामना किया होगा! 
और अंततः अपनी अथक मेहनत के बलपर उस विरान बंजर भूमि को रहने लायक स्वर्ग बना दिया जिसका नाम आज पृथ्वी के मानचित्र पर मारिशस है। नमन है मेरे पूर्वज। नमन है मारिशस। 
मैं जब जब मारिशस को पढ़ता हूं। भावुक हो जाता हूं। पता नहीं क्यों ऐसा लगता है जैसे मेरा उनके साथ गरभनाल का रिश्ता जुड़ा हुआ है। मेरे आंखों पर समुद्र भर पानी हिलोरे मारने लगता है।
आज वही मारिशस से सध् प्रकाशित 'विश्व हिन्दी साहित्य' का 2023 वां अंक आया है जिसे उलाट पुलाट कर अपने पुर्वजों के छुअन को अह्सास कर रहा हूं। मन पुलकित है इस पत्रिका में मेरी भी एक लघुकथा प्रकाशित हुई है 'अब नहीं जाऊंगी मां।' 
धन्यवाद आदरणीय डा. माधुरी रामधारी जी व डा. शुभंकर मिश्र जी । आपको कोटि-कोटि प्रणाम।

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