Rangnath Dubey's Poems
Wednesday, 18 March 2026
तवायफ की कब्र है
(तवायफ़ की कब्र है)
यहाँ चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती!
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
आज भी करती है,ये रुहें मूज़रा,
फिर फूट के रोती है!
ऐ,रंग---बस आ जाते है खिज़ा में,
दरख्त़ो के चंद पत्ते------
आवारगी करने।
ये शहर की मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है।
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