मै हर रोज,
बहाने बनाकर घूम जाता हूं
नमाज़ के वक़्त
मस्जिद के बगल से,
जो गुजरती है--
चंद चूड़ीहारो की गली की तरफ से!
मैं-
उसे एक बार फिर से देखने की चाह में,
तमाम चूड़ियों के,
दुकानो की तरफ देखता हूं,
कि शायद वे किसी दुकान पे,
दिख जाए मुझे,
अपनी नाजुक सी कलाई में,
पहनती हुई
किसी चूड़िहार से चूड़ियां.
वे मुझे,अगले जुमें तक!
नही दिखी,
शायद वे किसी और शहर से थी,
मै ज्यों घुमा,उदास होकर
तभी मेरी अचनाक नज़र पड़ी,
और मैं अपने होशो हवास खो बैठा
क्योंकि-
वे आ रही थी सामने से,
अपनी सहेलियो के संग,
चूड़ीहारों की गली की तरफ,
मुझे यूं लग रहा था,
कि जैसे,
बज रही हो उस पूरी गली में,
चूड़ीहारों की,
मेरी महबूबा के हाथों में पहनी,
मेरे मोहब्बत की---
महबूब चूड़ियां!
सच आज---
वे मेरी शरीके हयात है,
जिसकी कलाई को चूमता हूं मैं
एक-एक आयत की तरह,
सच किसी मस्जिद से कम नहीं,
पाकीजा,
मेरे घर और मेरे कमरे की चूड़ियां.
🌹🌹सर्वाधिकार सुरक्षित 🌹🌹
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