यहां चराग नही जलते,
कोई चादर नही चढ़ती,
ये शहर की---
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.
आज भी करती है ये रुह़े मुज़रा,
फिर फूट के रोती है,
ए,रंग--
बस आ जाते है खिज़ा में--
दरख्त़ो के चंद पत्ते
आवारगी करने
ये शहर की---
मशह़ूर तवायफ़ की कब्र है.
✍️✍️यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित हैं इसका बिना मेरी अनुमति के कहीं अन्य या अपने नाम से ना पोस्ट करें💐💐
रचनाकार---रंगनाथ द्विवेदी
जज कॉलोनी,मियापुर
जिला--जौनपुर 222002 (U P)
mo.no.7800824758
rangnathdubey90@gmail.com
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