लेते है--
चाय की,चुस्कियां
हमारे शहर में,
"कबीर" और "दादू" के होंठ.
और चाय भी
बड़े फक्र से लगती है,
अलसुबह
हमारे शहर में---
हिंदी और उर्दू के होंठ..
तहजीब और सलीका
हमारी रवायत हैं
तभी तो
पंडित को "राम राम"
कहने को खुलते हैं
यहां सबसे पहले "मौलवी के होंठ".
✍️✍️"यह रचना मेरी स्वलिखित व अप्रकाशित हैं,अतः बिना किसी भी प्रकार के अनुमति के इसका कहीं अन्यंत्र इस्तेमाल ना करें"🙏🙏
रंगनाथ द्विवेदी,
जौनपुर, उत्तर प्रदेश
mo.no.-7800824758
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