कभी किसी शनिवार वे आते है,
कभी किसी शनिवार मै जाती हूं!
ये भागमभाग,
ये नौकरी,ये भीड़
कि उबन से दुर--
कभी किसी इतवार वे मुझे पाते है,
कभी किसी इतवार मै उन्हें पाती हूं!
फिर अगली सुबह-लौटना होता है,
कभी दरवाजे़ पे वे मुझे छोड़ने आते है,
और कभी दरवाजे पे मै उन्हें छोड़ने जाती हूं!
इसलिये ए ,"रंग"----
अब हमारी जिंदगी मे इतवार केवल दिन नही,
मोहब्बत है,
जो हम एक दुसरे से कर पाते है!
रचयिता----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
नौकरीपेशा लोगो का वे इतवार जिसका इंतज़ार वे बड़ी शिद्दत से एक दुसरे के लिये अलग-अलग शहरो में पुरे हफ्ते ट्रेन पे न बैठनें तलक करते है "!
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