मुझे याद है वे शाम-------
जब मेरे पास से उदास जा रही थी,
फिर ना आने के लिये कभी मेरी जिंदगी मे,
मेरी सुफी।
मै इस खिज़ा का गुनाहगार था अपने,
वे तो निकल आई थी मेरे लिये बहुत दुर,
आज तड़प के जा रही मुझ बेवफ़ा से----
बेगुनाह!मेरी सुफी।
दो कौम थे हम हिन्दू और मुसलमान,
उसने पहले भी कहां था,
हम चले कुछ दुर फूलो तलक,
खार पे चलना हुआ तो तन्हा रह गई------
आह!मेरी सुफी।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.-----7800824758
@@@शायद हर शहर में तड़प रही होगी कही न कही किसी न किसी की बेगुनाह सुफी।
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