इंतजार करती है,
अपने कोठे पर बैठ हर शाम कोई ग्राहक!
न आने पर फिर वहीं से खोलती है,
जहा से उसने मोड़ रखा था--
जय शंकर प्रसाद की "कामायनी" की
किताब को.
डबडबाई आँख मे 'मनू'
और 'इडा' से ज्यादा,
भर आते है "आँसू" !
ये अथाह पिड़ा के फफोले का फूटना
हर रोज सहती है,
इसी कोठे पर---
जब कोई आता दिखता है,
तो टुटी कुंडी वाले दरवाज़े की तरफ
बढ़ चलती है,
ग्राहक की जल्दबाजी में,
बंद करते दरवाज़े की टुटी कुंडी की आवाज़,
का मतलब वे समझ-
अपने एक-एक कपड़े को उतारती है,
और चारपाई पर--
उसका ग्राहक पैसे सुलता है!
फिर थकी मादी उठती है,
मरहूम जय शंकर प्रसाद की
ये "जीवित कामायनी"!
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर (उत्तर प्रदेश)
mo.no.----7800824758
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