मै घंटो बतियाता हूं माँ की कब्र से,
मुझे एैसा लगता है कि जैसे-------
इस कब्र से भी मेरी माँ की दुआ आती है।
नही करती मेरी सरिके हयात भी ये यकिने मोहब्बत,
कि इस बेटे से मोहब्बत के लिये,
कब्र से बाहर निकल----------
मेरे माँ की रुह यहां आती है।
जब कभी थकन भरे ये सर मै रखता हू,
कुछ पल को आ जाती है नींद,
किसी को क्या पता?-----------
कि मेरी माँ की कब्र से जन्नत की हवा आती है।
एै,रंग----ये महज एक कब्र भर नही मेरी माँ है,
जिससे इस बेटे के लिये अब भी दुआ आती है।
@@@रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
mo.no.----7800824758
####माँ पे लिखी एक बेहतरीन नज्म़ आप सबो के हवाले।
No comments:
Post a Comment