सदन है---
लेकिन अटल कोई नही.
वे घंटो अपनी रौ मे बोलते,
कभी अपनी
तो कभी सब के मन की गाँठ खोलते,
कहकहे , ठहाको के बीच
वे उनका चुटिलापन,
कितना खाली हो गया है,सदन--
शायद!
अब भी उनका हल कोई नही.
सदन है----
लेकिन अटल कोई नही.
ना झुका,
ना रुका पोखरण तक,
शायद!
राष्ट्रभक्ति थी उनके अंतःकरण तक
लेकिन वे पड़ोस को चाहते भी थे,
तभी तो बस ले लाहौर तक,
लेकिन छल किया मुशर्रफ़ ने
और अटल के मन मे था महज़ प्यार,
ऐ "रंग" छल कोई नही.
सदन है----
लेकिन अटल कोई नही.
वे स्वर्ग में हो ये कामना है,
सच सियासत मे उनके बाद
बस टाट ही आये,
उनके जैसा--
रेशमी मखमल कोई नही.
सदन है---
लेकिन अटल कोई नही.
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित हैं.
रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर(उत्तर-प्रदेश)
mo.no.-----7800824758
rangnathdubey90@gmail.com
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