१-------
मै घंटो बतियाता हूँ माँ की कब्र से,
एै,रंग----ऐसा मुझे लगता है कि!
जैसे इस कब्र से भी---------------
मेरे माँ की दुआ आती है।
२--------------
भूखी माँ सुबह तलक----
भूख से बिलबिलाती बेटी के लिये,
लोरी गाती रही।
पड़ोसियो ने कहा बेटी मर गई,
एै ,"रंग"----वे इस सबसे बे-खबर!
कहके चाँद को रोटी गाती रही।
३-----------
माँ---------------
मै आज ढ़ेरो खाता हूँ,
पर तेरी चुपड़ी रोटी की भूख रह जाती है।
आज सब कुछ है-----------
स्लिपवेल के गद्दे,एसी कमरे,
पर नींद घंटो नही आती है।
एै,"रंग"----यादो मे!
माँ की गोद और लोरी रह जाती है।
४-----------
बचपन होता बचपन की चोरियाँ होती,
माँ मै चैन से सोता--------------
इस पत्थर के शहर में,
गर तु होती और तेरी लोरियाँ होती।
@@@एक मर्तबा अवश्य पढ़े शायद यादो की रेत पे माँ की सुरत उभर आये।
@@@@रचयिता------रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,जौनपुर।
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