Rangnath Dubey's Poems
Wednesday, 24 July 2024
(करोड़ों की इमारत में घुट रही है)
(करोड़ो की इमारत मे घुट रही है)
मुझे रुला के गई थी,वे बेवफ़ा-------
वहाँ खुश रहने,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
पर उसकी हवस-ए-दौलत का ये सिला हुआ------------
कि वे आज ऐ,रंग---------
करोड़ो की इमारत मे घुट रही है।
No comments:
Post a Comment
Newer Post
Older Post
Home
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
No comments:
Post a Comment