Tuesday, 30 July 2024

(भाई के बांधे चीर पर)

(भाई के बांधे चीर पर)
जुये में द्रोपदी को हारकर-------
जब झुक गये पतियो के सर,
गुँगी हो गई सभा-------------
रो उठी फिर द्रोपदी,
अपने इस तकदीर पर।
वे भी जुआ खेल गई आखिरी लम्हे----
अपने कृष्ण जैसे बीर।
दौड़ पड़े नंगे पाँव कृष्ण भी-----
तब बहन की पीर पर।
गर न आते टूट जाती रस्म राखी की,
फिर कोई भाई ना आता मायके से,
ना फक्र करती एक बहन,
दूःख के दिनो में------------
अपने भाई को बांधे चीर पर।

###रचयिता-----रंगनाथ द्विवेदी।
एडवोकेट कालोनी,मियाँपुर
जौनपुर।
@@@आप सभी को रक्षाबंधन पर्व की ढ़ेरो बधाई।

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