वे बागां दी बुलबुल, वे डल झील,
वे शिकारें,
हमारी मिट्टी-ऐ-मोहब्बत कश्मीर,
हमें ख्वाबों में पुकारे.
ये सियासत, ये साजिश-ऐ-अलगाव,
कि हम कश्मीरी पंडित पड़े हैं,
खानाबदोशों से बदतर ऐ दिल्ली,
तेरी सड़कों के किनारे.
वे गुल, वे केशर ,
वे सेब के बगीचे,
उफ!! नहीं आती वे खुशबू
ना आती है, वैसी ---
यहां तक हवा रे.
ये लाश-ऐ-मईयत ,
ये रूह-ऐ-तड़प है,
ऐ "रंग"---
हम कैसे होगें, जन्नतनशीं ,
ऐ कश्मीर ----
तेरी पाक़ मिट्टी के बिना रे.
रचनकार -- रंगनाथ द्विवेदी
जज कालोनी मियाँपुर
जिला-जौनपुर 222002(U.P.)
Mo.N.7800824758
यह रचना मेरी स्वरचित व अप्रकाशित है.
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